हम मिलने आते थे…

तन्हाई ……कभी कभी ये तन्हाई भी बहुत अच्छी होती है
जब हम अपने आप को, अपनी सोच, अपने विचारों को भूल चुके होते हैं तब ये तन्हाई ही होती है जो फिर से हमें ख़ुद से रूबरू कराती है

बेझिझक अपने आप से, अक्सर हम मिलने आते थे
कहते थे दिल की हर बात, ख़ुद से ख़ूब बतियाते थे
तन्हाई में कुछ नग़मे, हम यूँ गुनगुनाते थे
रूबरू होते थे ख़ुद से, दूर कमियाँ अपनी भगाते थे
याद जब करते थे तुमको, मन ही मन मुस्कुराते थे
बातें सोचकर तुम्हारी, हम ख़ूब इठलाते थे
अंजान थे हम दुनिया के दस्तूर से, ये मालूम न था
हक़ीक़त न बनेंगें ख़्वाब, जो हम दिन-रात सजाते थे
बेझिझक अपने आप से, हम अक्सर मिलने आते थे

-तूलिका श्रीवास्तव “मनु”