खिलौने टूट जाते हैं…

आजकल प्रतिस्पर्धा की होड़ में हम अपनी आकांक्षायें, अपेक्षायें अपने बच्चों पे इस कदर थोप रहे हैं कि वे समय से पहले ही बहुत बड़े हो जाते हैं। इस अंजान होड़ में वे अपना बचपन और बचपना जी नही पा रहे हैं। और इसके लिए कहीं न कहीं हम माता-पिता ही ज़िम्मेदार हैं।

दिखावे की मची इस झूठी होड़ में
उम्मीदों का भार लादे जाते हैं
कुचलते हैं बचपना अनजाने में
पर कहाँ हम भी ये समझ पाते हैं
वक़्त नहीं खेलने का भी मासूमों पे
इधर उधर बस भागते ही रह जाते हैं
जी भर खेल नहीं पाता बचपन इनको
और रखे रखे ही खिलौने टूट जाते हैं

-तुलिका श्रीवास्तव “मनु”