वेदना…..

tulikakinazarse

एक और कविता के द्वारा अपनी भावनाओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूँ। इस कविता के माध्यम से मैंने मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाया है। मैं इस कविता की ज़्यादा भूमिका बाँधना नहीं चाहती, बस इतना बताना चाहती हूँ कि जब भी मैं इस कविता को पढ़ती हूँ तो गला भर आता है और आँखे नम होने लगती हैं। आशा है कि आपके दिल को भी यह पंक्तियाँ उतना ही छू पायेगीं।

⇦ मनुष्य की वेदना ⇨

जब हुआ उसका जन्म, आँख एक क्षण को खुली
उसने पाया हर तरफ खुशनुमा माहौल था

बचपन आया हँसता खेलता रहा,
प्यार और दुलार उसको, सबका खूब मिलता रहा
दुनिया से अन्जान था वो, और कोई चिन्तन न था

फिर रखा यौवन की देहलीज़ पर उसने कदम
हर तरफ कठिनाइयों कर्तव्यों का था सागर अथाह
वह खड़ा था बीच में, पार करना संयम से था

पार…

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Author: तूलिका श्रीवास्तव "मनु"

जब कोई भी बात मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर देती है तो मैं लिखने के लिए विवश हो जाती हूँ।

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